नज़र है.......
मगर वो नज़र क्या कि जिस ने,
ख़ुद अपनी नज़र का नज़ारा न देखा.
डूबते हुए कस्ती का किनारा न देखा हो,
हम लुटे उसके मोहब्बत मे कबके,
कि फिर से निकले का सहारा न देखा हो,,
अभय बलरामपुरी
मगर वो नज़र क्या कि जिस ने,
ख़ुद अपनी नज़र का नज़ारा न देखा.
डूबते हुए कस्ती का किनारा न देखा हो,
हम लुटे उसके मोहब्बत मे कबके,
कि फिर से निकले का सहारा न देखा हो,,
अभय बलरामपुरी
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