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Showing posts from December, 2017
हाँ मैने प्यार किया धीरे,धीरे दिल बे करार किया धीरे ,धीरे अपनो को खुद से दूर किया खुद को खुद से मजबूर किया उनके ख्वाबों को पिरोया धीरे, धीरे उनकी मोहब्बत भी कैसी,मोहब्बत है उसने इनकार किया धीरे ,धीरे न जाने क्यों याद आयी आज उनकी हम बेकरार हुए मिलने को उनसे वो न आए मिलने मुझसे ऐ"अभय" मुझको गुमराह किया धीरे, धीरे दिल की दरिया मे सेमेटे उनकी यादे उनकी यादो को यादो से जुदा किया धीरे धीरे दिल तो रोया है बहुत,उनकी मोहब्बत मे दिल को बहलायेंगे अब धीरे धीरे हाँ मैंने प्यार किया धीरे धीरे           अभय बलरामपुरी
सताते बहुत हो, कभी मनाकर तो देखो दुख सुने हो बहुत,कभी पाकर तो देखो परेशान कितने हैं, हमे पाने के लिए कभी हमारे पास आकर तो देखो अभय बलरामपुरी
रात का आलम दर्द -दे-जुदाई, और मेरी तनहाई है।। लौट के आजा जाने , जाने वाले याद तेरी फिर आई है।। तर के तालुक करने वाले , तुझको ए भी याद नही।। साथ जियेगे साथ मरेगे , तुमने कसम ए खाई है।।
मकड़ी जैसे मत उलझो, तुम गम के ताने बाने में, तितली जैसे रंग बिखेरो, हँस कर इस ज़माने में,।। जलते है जो जलने दो, अपना क्या जाता है जलाने मै, तितली जैसे रंग बिखेरो, हँस कर इस ज़माने में,।। हॅस कर पार करो तुम , नय्या बीच फसी मझधारे मे, जो है दरिया मै बैठे, उनको पार लगाने मै, तितली जैसे रंग बिखेरो, हँस कर इस ज़माने में,।। अभय बलरामपुरी
नज़र है....... मगर वो नज़र क्या कि जिस ने, ख़ुद अपनी नज़र का नज़ारा न देखा. डूबते हुए कस्ती का किनारा न देखा हो, हम लुटे उसके मोहब्बत मे कबके, कि फिर से निकले का सहारा न देखा हो,, अभय बलरामपुरी
इन्सान को परखना हो तो बस इतना कह दो मैं मुसीबत में हुं... फिर देखो वो कैसे बदलते है जैसे गिरगिट अपना रंग बदलते है अभय बलरामपुरी
हमको इतना भी बुरा ना समझो ऐ लोगो..                                    दर्द लिखने की आदत है ,दर्द देने की नही..                                  अभय बलरामपुरी
तुम्हारी यादों से है मेरी ज़िन्दगी में रौनक इसलिए अपनी नहीं तुम्हारी ज़िन्दगी की हम दुआ करते हैं..... अभय बलरामपुरी
मै यादो का किस्सा खोलू तो कुछ दोस्त बहुत याद आते है,,।। मै गुजरे पल को सोचू तो,,कुछ दोस्त बहुत याद आते है।।       अब जाने कौन सी नगरी मै,,आबाद है जाके मुद्दत से,,।।    मै देर रात तक जागू तो,,कुछ दोस्त बहुत याद आते है।।    कुछ बाते थी फूलो जैसी,,कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,,।। मै शहरे चमन मै टहले तो,, कुछ दोस्त बहुत याद आते है।।
शायर हूँ साहब 'अल्फ़ाज़ो' की मिट्टी से 'महफ़िलों' को सजाता हूँ।। कुछ को 'बेकार' ......कुछ को 'कलाकार' नज़र आता हूँ।। अभय बलरामपुरी
तेरे इश्क ने सरकारी-दफ्तर बना दिया इस दिल-को; ना कोई काम करता है, ना कोई बात-सुनता है अभय बलरामपुरी
कुछ कहानियों के अंत कहाँ लिखे होते हैं... बस खामोशियां फैल जाती हैं, दूर,दूर तक ..... अभय बलरामपुरी
काश…!! एक खवाहिश पूरी हो इबादत के बगैर…!!! वो आ कर गले लगा ले….. मेरी इजाजत के बगैर!!!!! अभय बलरामपुरी
माना कि बहुत खास हूँ मैँ दुनियाँ वालोँ के लिए... लेकिन कोई नहीँ रोएगा चंद लम्होँ से ज्यादा मेरे गुजर जाने के बाद... अभय बलरामपुरी
ढलते दिसम्बर के साथ ही सारी खतायें माफ़ कर देना दोस्तों..... क्या पता जब दुबारा दिसम्बर आये तो हम रहे ना रहे.                              अभय बलरामपुरी
सिर्फ तुझे ही मेरी खबर नहीं है..... जो लोग कुछ भी नहीं लगते वो पूछते है मेरी ख़ामोशी की वजह                                     अभय बलरामपुरी
ये फिक्र, ये आदबतें ये अंदाज-ए-गुफ्तगू संभल जाओ हमे तुमसे मोहब्बत हो रही है. अभय बलरामपुरी