मकड़ी जैसे मत उलझो,
तुम गम के ताने बाने में,
तितली जैसे रंग बिखेरो,
हँस कर इस ज़माने में,।।
जलते है जो जलने दो,
अपना क्या जाता है जलाने मै,
तितली जैसे रंग बिखेरो,
हँस कर इस ज़माने में,।।
हॅस कर पार करो तुम ,
नय्या बीच फसी मझधारे मे,
जो है दरिया मै बैठे,
उनको पार लगाने मै,
तितली जैसे रंग बिखेरो,
हँस कर इस ज़माने में,।।
अभय बलरामपुरी


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